औरंगाबाद

नगर परिषद द्वारा जुलाई 2021 में आबंटित की गई दुकानों की होगी जांच, जिलाधिकारी ने उप विकास आयुक्त को जांच का दिया निर्देश

आरटीआई एक्टिविस्ट रविंद्र कुमार सिंह द्वारा मांगी गई सूचना एवं कारवाई की मांग के आलोक में जिलाधिकारी ने दिया जांच का निर्देश

औरंगाबाद। नगर परिषद के द्वारा हाल ही में बंदोबस्त किए गए दुकान में अनियमितता के आरोप को लगाते हुए शहर के आरटीआई एक्टिविस्ट रविंद्र कुमार सिंह ने जिला पदाधिकारी सह द्वितीय अपीलीय प्राधिकार से सूचना के तहत कई बिंदुओं पर जानकारी मांगते हुए कारवाई की मांग की थी।उन्होंने नगर परिषद औरंगाबाद द्वारा दुकानों की बंदोबस्ती में धांधली एवं विज्ञापन में प्रकाशित तिथि के विरुद्ध गलत तरीके से बंदोबस्ती करने का आरोप लगाया था। श्री सिंह के द्वारा मांगी गई सूचना के आलोक में जिला पदाधिकारी ने सुनवाई के क्रम में उप विकास आयुक्त को पूरे मामले की जांच कर विधि संवत कारवाई करने का आदेश निर्गत किया है।

 

गौरतलब है कि श्री सिंह द्वारा जिला पदाधिकारी से नगर परिषद के द्वारा दुकानों की बंदोबस्ती में बरती गई अनियमितता की बिंदूवार सूचना देकर कार्रवाई की मांग की गई थी। श्री सिंह के द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए आवेदन में यह जानकारी दी गई थी कि नगर परिषद औरंगाबाद कार्यालय द्वारा दिनांक 5/7/2021 को 8 अदद दुकानों की खुले डाक से बंदोबस्ती की तिथि एवं आवेदन जमा लेने की अंतिम तिथि 3/07/2021 निर्धारित की गई थी। लेकिन निर्धारित तिथि में छेड़छाड़  कर गलत तरीके से सूचना के माध्यम से हेरफेर कर दुकानों की बंदोबस्ती कराई गई। जिसके अनेकों साक्ष्य मौजूद हैं। श्री सिंह ने बताया कि मौजूद साक्ष्य का अध्ययन करने के पश्चात यह स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि दुकानों की बंदोबस्ती में बिहार नगर पालिका अधिनियम के विरुद्ध बृहद पैमाने पर धांधली की गई।

 

श्री सिंह के द्वारा दिए गए साक्ष्य में दुकानों की बंदोबस्ती हेतु भाग लेने वाले प्रतिभागियों से खुला आवेदन पत्र का लेना, विज्ञापन में छपी खबर के अनुसार आवेदन पत्र लेने की अंतिम तिथि 3/07/2021 की तारीख को बिना विज्ञापन के माध्यम से ही बदलाव करते हुए 5/7/2021 एवं 6/7/2021 तक आवेदन पत्र जमा लेना, विज्ञापन में छपी खबर को विज्ञापन के जरिए ही तिथि में बदलाव नहीं कर पाना, कार्यपालक नगर परिषद के ज्ञापांक 1047 दिनांक 3/7/2021 को सूचना जारी कर 5/7/ 2021 एवं 6/7/2021 एवं 7/7/2021 को होने वाली दुकानों की बंदोबस्ती को स्थगित करना, पुनः दुबारा कार्यालय नगर परिषद द्वारा 1047 दिनांक 3/7/2021 को सूचना जारी कर 7/7/2021 को ही दुकानों की बंदोबस्ती करा देना,एक ही ज्ञापांक एवं एक ही दिन में दो सूचना कार्यालय की दीवार पर चिपका कर मामले को बदल देना,8 अदद दुकानों में से 7 दुकानों की बंदोबस्ती में डाक बोलने वाले एक दूसरे प्रतिभागियों का एक ही बैंक से एक ही तिथि तथा एक ही खाता से एक दूसरे का ड्राफ्ट बनाकर जमा करना, डाक की बोली में एक दूसरे के प्रतिद्वंदी के रूप में पिता और पुत्र का बोली लगाना, बिहार अधिनियम में 11,2007 की धारा 53 में वर्णित तथ्य यह कि किसी पार्षद या उसके परिवार जैसे पार्षद पति, पत्नी, अविवाहित पुत्र – पुत्री के किसी सदस्य को संविदा नियोजन व अन्य मामलों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आर्थिक लाभ व आर्थिक हित रखने वाला की समझा जाएगा।

 

बिहार सरकार विधि विभाग द्वारा जारी नियमों की अवहेलना कर दुकानों की बंदोबस्ती करा देना, बिहार अधिनियम 11, 2007 की धारा 53 में वर्णित तथ्यों की अनदेखी करते हुए नगर कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा पार्षद के पति,पार्षद की पत्नी, पार्षद के पुत्र व पार्षद के रिश्तेदारों के नाम दुकानों की बंदोबस्ती करा देना, बिहार सरकार विधि विभाग द्वारा जारी नियम यह कि नगर कार्यपालक पदाधिकारी की जिम्मेवारी होगी कि पार्षद के परिवार को संबंधित नगर निकाय में किसी प्रकार का आर्थिक हित व आर्थिक लाभ ना हो इस पर नियंत्रण करना शामिल है। उसके बावजूद नगर कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा आर्थिक लाभ ले रहे पार्षदों पर नियंत्रण नहीं करना एवं इन सबूतों के बावजूद नगर कार्यपालक पदाधिकारी द्वारा अवैध तरीके से पार्षद के परिवार व पार्षद के रिश्तेदारों को दुकान आबंटित करा दी गई।

 

श्री सिंह ने बताया कि उच्चतम न्यायालय ने दायर एक याचिका की सुनवाई के दौरान यह फैसला सुनाया कि निगम पार्षद लोकसेवकों की श्रेणी में आते हैं। अतः निगम पार्षदों पर लोकसेवकों पर लागू होने वाले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act, 1988) के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने यह फैसला 30 अक्टूबर 2013 को सुनाया था।

 

राजस्थान के बांसवाड़ा में निगम पार्षद रहे मनीष त्रिवेदी की याचिका की सुनवाई कर रही उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश सी के प्रसाद तथा जे एस खेहर की खंडपीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की परिभाषा के दायरे को व्यापक बनाने का प्रावधान किया गया है एवं इसे लोकसेवा को साफ-सुथरा बनाने के लिए ही लाया गया था।

 

निर्णय सुनाते समय खंडपीठ ने लोकसेवकों की परिभाषा की व्याख्या की – निगम पार्षद भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अनुच्छेद 2 (सी) के तहत लोकसेवकों की श्रेणी में आते हैं.  इस अनुच्छेद का आठवें उपखंड के अनुसार कोई भी व्यक्ति, जो किसी ऐसे पद को धारण करता है जिसके माध्यम से लोक सेवा की जाती हो, लोकसेवक की श्रेणी में आता है।

 

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