औरंगाबाद

औरंगाबाद में रूढ़िवादी परंपरा से अलग होकर नातिन ने नाना का किया अंतिम संस्कार,बनारस के मणिकर्णिका घाट पर दी मुखाग्नि

सिन्हा कॉलेज के छात्र संघ की अध्यक्ष आशिका सिंह ने अपने नाना को दिया आग,बेटे की तरह किया समस्त कर्मकांड, कुटुंबा प्रखंड के डुमरा गांव की रहने वाली है आशिका

औरंगाबाद में रूढ़िवादी परंपरा से अलग होकर नातिन ने नाना का किया अंतिम संस्कार,बनारस के मणिकर्णिका घाट पर दी मुखाग्नि

सिन्हा कॉलेज के छात्र संघ की अध्यक्ष आशिका सिंह ने अपने नाना को दिया आग,बेटे की तरह किया समस्त कर्मकांड, कुटुंबा प्रखंड के डुमरा गांव की रहने वाली है आशिका

 

औरंगाबाद। अब वह जमाना गया जब कहा जाता था कि पुत्र बिना गति नहीं, परंतु बिहार के औरंगाबाद जिले के अम्बा प्रखंड के देव रोड डुमरा निवासी रामविलास सिंह की नातिन आशिका सिंह ने न सिर्फ अपने नाना के मृत्योपरांत उनके शव को कंधा दिया बल्कि बनारस के मणिकर्णिका घाट पहुंचकर मुखाग्नि दी और समस्त कर्मकांड किया। आशिका अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद बिहार की प्रदेश सह मंत्री व सच्चिदानन्द सिन्हा कॉलेज के छात्र संघ की अध्यक्ष है।

 

आशिका के नाना पिछले एक वर्ष से बीमार चल रहे थे और उनकी बीमारी को दूर कराने के लिए उन्हें लगातार औरंगाबाद के साथ साथ पटना के आईजीआईएमएस, पीएमसीएच के साथ साथ कई निजी नर्सिंग होम में इलाज कराए गए। लेकिन इन सभी अस्पतालों में 24 घंटे आशिका अपने नाना के साथ रही एवं उनका देखभाल एक बेटे की तरह किया। चुकी स्व रामविलास सिंह के पुत्र नहींथे इसलिए उन्होंने अपने नातिन में ही पुत्र को ढूंढ लिया और उन्होंने उसे नातिन नही नाती ही मान लिया।आशिका ने जबसे होश संभाला वैसे ही उसने उन्हें एक बेटे की तरह ख्याल रखा।

 

पिछले दो महीने पूर्व पटना के एक अस्पताल में आइसीयू में रखने के बाद भी जब डॉक्टर ने यह कह दिए की हार्ट ब्लॉक हो गया है अब उम्मीद कम है बस एक दो दिन से ज़्यादा जीने की उम्मीद नही है। उसके बावजूद आशिका ने हिम्मत नही हारी और घर वापस लाकर जी जान से सेवा की और यही कारण है कि उसके नाना दो माह तक जीवित रहे।

 

रामविलास सिंह गाँव के ज़मींदार थे और उन्होंने कईं ऐसे गरीब परिवारों को दान में जमीन दे दिया था जिनका परिवार आज घर बनवाकर फसल उगाकर सम्पन्न जिंदगी जी रहे है।गरीब बेटियों की शादी में पैसे देकर मदद करना हो चाहे जरूरतमंदों का इलाज के पैसे कपड़े दान करना ये सब उनके स्वभाव में था। जिनसे प्रेरणा लेकर ही आज अशिका ने भी समाज सेवा कर अपनी एक अलग पहचान बनाई।सनातन धर्म के अनुसार शव यात्रा में शामिल होने, अर्थी को कंधा देने और मुखाग्नि देने जैसे कर्मकांड पुरुष ही करते हैं। महिलाओं की भूमिका घर तक ही सीमित है परंतु अशिका ने अर्थी को कंधा भी दिया और वाराणसी श्मशान घाट पर उन्हें मुखाग्नि भी दी और पूरे कर्म कांड कर रही है।

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