औरंगाबाद

‘कविता बोल पड़ी सोन नद से,चाँदनी में नहाई नहाई’ के साथ नदी के तट पर बही काव्य धारा

औरंगाबाद। सोन नद के पावन तट पर डेहरी प्रखंड में आयोजित भव्य कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए उक्त काव्य पंक्तियों के द्वारा ओजस मागधी मंच के अध्यक्ष डॉ हेरम्ब कुमार मिश्र ने कार्यक्रम का आगाज़ किया। डेहरी के प्रखंड विकास पदाधिकारी पुरुषोत्तम त्रिवेदी के जन्मदिन के अवसर पर उनके ही आवासीय परिसर में ओजस के कई ख्यातिलब्ध कवियों ने अपनी कविताओं से भरपूर शमां बाँधी।

 

 

सर्वप्रथम केक काटकर त्रिवेदी जी का जन्मदिन मनाया गया।उसके उपरांत उन्होंने आमंत्रित कवियों को अंग वस्त्र व माल्यार्पण से सम्मानित किया। अध्यक्षता जनार्दन मिश्र जलज ने की और नागेंद्र केसरी ने वंदना से कवि सम्मेलन की शुरुआत की।उसके बाद एक एक कविताएँ दर्शकों के दिल में जगह बनाने लगीं।

 

 

चंदन पाठक की कविता ‘हूं पड़ा मझधार में सुन नंद नंदन हे प्रभो,मै अधम खल नीच हूं चंदन बना दो हे प्रभो’ ने भक्ति रस का भरपूर अवगाहन कराया तो अनिल अनल की कविता ‘है सिसकता खड़ा आदमीयत कहीं, आदमी में यहां आदमी खो गया’ यथार्थता का अवलोकन कराती हुई श्रोताओं को मंत्र मुग्ध कर दी।विनय मिश्र मामूलीबुद्धि ने ‘ये जन्मदिन मनता रहे हर्षोल्लास से —उमंग उत्साह विश्वास से सदियों मनता रहे हर्षोल्लास से।जिसने जन्मदिवस पर साहित्य रस पी लिया उसने बनारस को अपना गुरु कर लिया’ कविता द्वारा जन्मदिन की हार्दिक बधाई अर्पित की तो कवयित्री प्रियंका तिवारी ने ‘मैंने राम नहीं देखा पर, आप में उन्हें पाया है’ द्वारा स्नेह और दाम्पत्य का अनुपम चित्र उपस्थित कर दिया।

 

 

नागेंद्र केसरी की कविता ‘धरती को धरती और आसमान को आसमान रहने दो,सूरज को सूरज, मंगल को मंगल और चाँद को चाँद रहने दो’ पर जोरदार तालियों की गड़गड़ाहट रही तो बीडीओ पुरुषोत्तम त्रिवेदी ने अपनी कविता ‘ तुझ से सजी है मेरी जिंदगानी,तुम्हारे बिना सब अधूरी कहानी’ द्वारा स्नेहमय जीवन की यथार्थता का बोध कराया जिसकी दर्शकों ने मुक्तकंठ से प्रशंसा की।

 

 

रामनाथ सिंह ने हास्य व्यंग्य की कविता ‘चुनाव आयोग ने भी मेरे साथ न्याय नहीं किया है, मांगा था उल्लू और गधा छाप दिया है’ से दर्शकों को खूब गुदगुदाया तो जनार्दन मिश्र जलज की कविता ‘मौसम तो आता-जाता है ।मेरा तो दिल का नाता है’ ने समरस भावों के कई रंगों को बिखेर दी जिसपर भरपूर वाहवाही हुई। कार्यक्रम का संचालन करते हुए डॉ हेरम्ब कुमार मिश्र ने अपनी चुटीली बातों एवं कविताओं से दर्शकों को झूमने पर विवश कर दिया और लोगों की मांग पर ‘झूमे अमवाँ के डार, लहालोट फागुन महीनवाँ’ वसंत गीत के साथ कार्यक्रम का समापन किया।

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