औरंगाबाद

शहर का सिरमौर दानी बिगहा पार्क,लेकिन……

राकेश पांडेय( लेखक, पुस्तक: “लोकराज के लोकनायक”)

औरंगाबाद। नगर परिषद द्वारा पार्क का निर्माण एवं उसका संचालन काबिल-ए-तारीफ है. अब हमारे पास इतराने और गर्व करने के लिए शहर का सिरमौर सत्येन्द्र ना. सिंहा पार्क है. इसके लिए नगर परिषद के सारे ऑफिशियल्स को हृदय की गहराइयों से धन्यवाद और वंदन.
नगर परिषद्,औरंगाबाद से कुछ पहलुओं पर अपील है ताकि भविष्य में यह पार्क पूरे बिहार के लिए नज़ीर बन सके.

पार्क में प्रवेश हेतु दैनिक और मासिक शुल्क की व्यवस्था है, किन्तु मासिक शुल्क जमा कराकर पास बनवाने का कार्य तकरीबन महीने दिन से बंद है जिसे शीघ्र शुरू कराये जाने की पहल होती. इससे दो फायदे होते. पहला, प्रतिदिन दैनिक टिकट में होने वाले कागज अपव्यय की बचत होती जो पर्यावरण हितैषी पहल होता. दूसरा, पास की प्राप्ति महीने भर के लिए अधिकार पत्र की तरह होता जो राजस्व में एकमुश्त मासिक वृद्धि करवाने की दिशा में अच्छी पहल होती.इस पार्क में वेलनेस सेंटर की सी संभावना है क्योंकि शहर के जागरूक नौजवान और बुजुर्ग सेहत सुधारने के लिए व्यायाम,माॉर्निंग वॉक जैसी गतिविधियों से जुड़े हैं और आगे भी जुड़ते रहेंगे.

अर्थशास्त्र मानता है कि 15-59 आयुवर्ग की आबादी ही कार्यशील (Working Population) है. बाकी के पंद्रह से नीचे और साठ के बाद के आयु के लोग आश्रित श्रेणी में आते हैं. फिलहाल मासिक पास बंद रहने की वजह से बुजुर्ग जनों को प्रतिदिन पांच रुपये के हिसाब से चुकता करना पड़ता होगा, जबकि उनके लिए मासिक शुल्क पचास रुपये तय है.


मेरी तो राय है कि नगर परिषद् को आश्रित आबादी श्रेणी के लोगों को नि:शुल्क प्रवेश देकर पूरे देश के लिए उदाहरण पेश करना चाहिए.जबकि कार्यशील आयुवर्ग के सभी लोगों के प्रवेश शुल्क को अनिवार्य किया जाता.वैसे पार्क की आरंभिक व्यवस्था की कितनी भी तारीफ़ की जाए ,कम है किन्तु समय के साथ मरम्मत कार्य पर ध्यान दिये जाने से व्यवस्था में कुशलता, निरंतरता और विश्वास पैदा होता है.आशा है कि मेरे अनुरोध पर नगर परिषद् ,औरंगाबाद सकारात्मक संज्ञान लेने की पहल करेगा.

 

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