औरंगाबाद

आरक्षण की बिसात पर किस करवट बैठेगा नगर निकाय का चुनाव

राकेश पांडेय

लेखक-लोकराज के लोकनायक

औरंगाबाद। बिहार में कुछ ही महीने बाद नगर निकाय के विभिन्न पदों का चुनाव होने वाला है.वैसे में औरंगाबाद में भी चुनावी तापमान चढ़ गया है. राजनीति में रुचि रखने वालों के बीच चुनावी चर्चा तेज हो गयी है. नगर के मुहल्लों के चौराहे और नुक्कड़ों पर बस जातीय समीकरण की गोटी बिछाते लोग अहले सुबह और देर रात मिलने लगे हैं. औरंगाबाद की खास बात यह है कि यहाँ मुहल्लों की बसावट भी जातीय आधार पर हुई है और किसी खास जाति के खास मुहल्लों में राजनीति की चर्चा में चिंतन का तत्व गहन मनन का रूख लेता दिख रहा क्योंकि एक ही जाति के बहुत सारे लोगों द्वारा उम्मीदवारी के दावे के बाद विजातीय अल्पसंख्यकों के विजय का भय सता रहा है.

 

उलझनें कई और भी हैं. राजनीति के धुरंधरों को अभी इस बात की भी चिंता सता रही है कि वर्तमान में नगर परिषद् के चेयरमैन का पद पिछड़ा/अत्यंत पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित है और सूत्रों के हवाले से मिल रही जानकारी के मुताबिक औरंगाबाद नगर परिषद् के चेयरमैन का पद अनुसूचित जाति/जनजाति के लिए भी आरक्षित हो सकता है.सूत्र बताते हैं कि शहर के संभ्रात कुछ अनुसूचित जाति के नेताओं की हालिया दिनों बढ़ी गतिविधियां राजनीति में दो तरफ इशारे कर रहा है. एक, नगर परिषद् के चेयरमैन का पद आरक्षित होने की संभावना के मद्देनजर दावेदारी का फौरन दावा किया जाएगा. दूसरा, राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी संभावना जतायी जा रही है कि बिहार विधान परिषद् के स्थानीय निकाय के कोटे का औरंगाबाद से भाजपा की तरफ से उम्मीदवारी का खेवनहार कोई दलित जमात का बन सकता है.

 

वैसे, जाति व गली मुहल्ले की राजनीति तक अब तक सिमटे कुछ लोग भी खुद को जमात का स्वयंभू नेता घोषित कर नगर परिषद् में चेयरमैन के लिए दावेदारी पेश करने में लगे हैं, वैसे में अबतक चेयरमैन पद पर आरक्षण की अस्पष्टता मतदाता और भावी उम्मीदवार के बीच उहा-पोह की स्थिति पैदा कर रहा है.

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