औरंगाबाद

यदि मदनपुर की पुलिस लेती संज्ञान तो बच जाती प्रतिमा की जान

औरंगाबाद। मदनपुर के पड़रिया गांव में 28 मार्च को पुलिस ने फंदे से लटकते हालत में प्रतिमा के शव को बरामद किया।प्रतिमा के परिजनों ने अपनी बेटी के हत्या का आरोप पति हिमांशु एवं ससुराल वालों पर लगाया है और इस मामले में मदनपुर पुलिस को भी कुसूरवार ठहराया है। मृतका के परिजनों ने बताया कि यदि मदनपुर थाना की पुलिस प्रतिमा के प्रताड़ना मामले में संज्ञान ले लेती तो उसकी हत्या नही होती।इस प्रकार प्रतिमा हत्या मामले में पुलिस की संवेदनहीनता तथा उनके द्वारा बरती गई लापरवाही को लेकर बुधवार की शाम ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा और कैंडल मार्च निकालकर पुलिस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की गयी।

मृतका के परिजनों के साथ कैंडल मार्च का प्रतिनिधित्व कर रहे खिरियावां पंचायत के सरपंच पति ने बताया कि प्रतिमा की हत्या मामले में जितना दोषी उसका पति हिमांशु है। उतना ही दोषी मदनपुर की पुलिस है। कैंडल मार्च में शामिल होकर विरोध प्रदर्शन कर रहे रहे मृतका के पिता, माँ  एवं बहन ने बताया कि जिस दिन प्रतिमा की हत्या कर के उसके पति और ससुराल वालों ने उसे फांसी पर लटका दिया था।उसी दिन प्रतिमा थाने में आकर अपने प्रताड़ना और हत्या किए जाने की आशंका से पुलिस को अवगत कराया था।

 

लेकिन बड़ा बाबू ने उसके आवेदन पर तनिक भी विचार नही किया और डांट कर भगा दिया। इधर अपनी सुरक्षा के लिए पुलिस के पास फरियाद लेकर आई प्रतिमा के लिए 28 मार्च का दिन काल बन गया और जैसे ही थाने से वह घर पहुंची वैसे ही क्रोधित हुए पति और ससुराल वालों ने उसी शाम उसकी हत्या कर उसे फांसी पर लटकाया और फरार हो गये।आक्रोशित लोगों ने इस मामले में दोषी पति की गिरफ्तारी और प्रतिमा की बात को संज्ञान न लेनेवाले पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई की मांग की है।

 

गौरतलब है कि बिहार में पुलिस पब्लिक समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से पुलिस के शाब्दिक अर्थ हिंदी में पुरुषार्थी, लिप्सारहित रहित और सहयोगी तथा अंग्रेजी में Polite, Obedient, loyal, intelligent, courageous and efficient बताया गया है।परंतु औरंगाबाद में कार्यरत कई पुलिस अधिकारियों या कर्मियों पर उपर्युक्त शब्दार्थ का एक अक्षर भी लागू नही होता।आए दिन लोग पुलिसकर्मियों की शिकायत लेकर वरीय अधिकारियों तक पहुंचते है और कार्रवाई ढाक के तीन पात वाली चरितार्थ होती नजर आती है।

 

इसका जीता जागता उदाहरण प्रतिमा हत्या मामले से देखा जा सकता है।क्योंकि यदि पुलिस 28 मार्च को थोड़ी भी जागरूक होती और मानवता का परिचय देती तो प्रतिमा की जान बच सकती थी।लेकिन ऐसा हो नही सका। हालांकि उक्त मामले में पुलिस अभी इस निष्कर्ष पर नही पहुंची है कि प्रतिमा की हत्या हुई या उसने आत्महत्या की है।क्योंकि घटना के दिन भी इस मामले को लेकर पुलिस अधिकारियों के द्वारा हत्या की भी और आत्महत्या की भी बात बताई गई।

लेकिन अब पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बाद ही यह खुलासा होगा कि प्रताड़ना से तंग आकर प्रतिमा ने आत्महत्या की है या ससुरालवालों ने उसकी हत्या की है। बहरहाल इस मामले में परिणाम कुछ भी आये लेकिन यह सवाल यक्ष प्रश्न की भांति खड़ा रहेगा कि प्रतिमा के द्वारा थाने पर आकर अपना दुखड़ा सुनाने के बाद भी मदनपुर की पुलिस ने कोई कार्रवाई क्यों नही की।

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