औरंगाबाद

दो दिवसीय कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम का हुआ समापन

अल्पवृष्टि को देखते हुए किसानों को खेती के कई विकल्पों की दी गई जानकारी

औरंगाबाद। कृषि विभाग आत्मा, औरंगाबाद के द्वारा संयुक्त कृषि भवन, औरंगाबाद के प्रशिक्षण सभागार में मंगलवार को दो दिवसीय कृषक वैज्ञानिक संवाद कार्यक्रम का समापन किया गया, जिसमें औरंगाबाद, बारून, ओबरा एवं देव प्रखंड के 100-110 किसानों से कृषि एवं कृषि से जुडे़ समस्याओं पर किसानों एवं कृषि वैज्ञानिकों तथा पदाधिकारियों के बीच संवाद किया गया।

 

जिला कृषि पदाधिकारी के द्वारा खरीफ मौसम में सुखाड़ के मद्देनजर आकस्मिक फसल योजना के तहत फसल लगाने पर विचार कर रही है। जिसमें अरहर, मक्का, उरद, आगत सरसो, आगत मटर, तोरिया, भींडी, मूली एवं कुल्थी का बीज लगाने हेतु प्रति किसान अधिकतम दो एकड़ खेतों में फसल लगाने के लिये निःशुल्क बीज उपलब्ध कराया जाएगा। ऑन लाईन आवेदन के माध्यम से आकस्मिक फसल का बीज वितरण किया जाएगा। समय-समय पर कृषि विभाग के अधिकारी आकस्मिक फसल योजना के तहत खेतों में लगाये गये फसल का निरीक्षण करेंगे। साथ ही उर्वरकों की उपलब्धता, कीट व्याधि रोग प्रबंधन, डीजल अनुदान योजना तथा किसानों के प्रशिक्षण एवं परिभ्रमण कार्यक्रमों पर चर्चा की गई।

 

जिला कृषि पदाधिकारी के द्वारा बताया गया कि औरंगाबाद एवं बारून प्रखंड के कुछ पंचायत जो सोन नहर से सिंचिंत हैं में लगभग 90-95 प्रतिशत रोपनी हुआ है। प्रखण्ड देव में अल्प वंर्षा के कारण सिचाई का साधन नही होने के वजह से धान की रोपाई कम हुई है।

 

कृषि विज्ञान केन्द्र के वरिय वैज्ञानिक एवं प्रधान डॉ. नित्यानन्द के द्वारा बताया गया कि पिछले एक सप्ताह के अन्तराल में रोपनी का प्रतिशत 36 प्रतिशत से 64 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई, इस संबंध में डॉ0 नित्यानन्द के द्वारा यह भी जानकारी दी गई कि धान के फसल का एक अनुवांशिक गुण होता है कि ज्यादा पुराना बीचड़ा (50-60 दिन का) लगाने से पौधे का विकास एवं धान का कल्ले की संख्या कम होती है एवं बाली की संख्या भी कम लगती है। इसलिये किसानों को यह चाहिये कि धान का बीचड़ा श्री विधि के तहत 12-13 दिन एवं अन्य विधि से लगाने के लिये 22-25 दिन का पुराना होना चाहिये जिससे कि पौधे का विकास एवं कल्ले की संख्या में वृद्धी होगी।

 

उन्होने धान के बीचड़ा के बारे में एक नई तकनीक बताई कि जब बीचड़ा तैयार कर रोपाई की जाती है तब बीचड़ा 14 दिनों तक अपना खुद का भोजन ग्रहण करता है एवं 15वां दिन से मीट्टी से ग्रहण करता है। इनके द्वारा बताया गया कि रबी फसलों की खेती के लिये एक निर्धारित योजना बनाकर ही किसानों को खेती करनी चाहिये। इसके तहत किसान को यह पता होना चाहिये कि इस मौसम में कौन सा फसल के लिये कौन सा बीज कब और कहाँ लगानी चाहिये। रबी फसल के तहत मसूर के पैरा खेती के बारे में भी बताया गया।

 

पैरा के रूप में मसूर की बीजाई पिछले फसल के कटने के 12-13 दिन पहले करनी चाहिये, यह प्रक्रिया अपनाने से पैरा फसल के पौधो का वानस्पतिक विकास के लिये अच्छी तरह से सुर्य का प्रकाश पौधो को मिल सके। डॉ0 नित्यानन्द ने यह भी बताया कि वैसे जगह जहाँ पर सिंचाई का साधन नहीं है वहाँ पर 15 अक्टूबर से 30 अक्टूबर तक चना एवं मसूर की विजाई कर देनी चाहिये एवं जहाँ पर सिंचाई का साधन है वहाँ 25 अक्टूबर-15 नवम्बर तक गेहूँ की बुआई कर देनी चाहिये जिससे कि पैदावार में दुगना की बढ़ोतरी हो सके।

 

इस कार्यक्रम के दौरान उपस्थित कृषकों, पदाधिकारीयों एवं वैज्ञानिकों के बीच हुऐ संवाद के अन्तर्गत किसानों के समस्याओं का सुझाव दिया गया जैसे-

किसान श्री नरसिंह यादव, कुशी टोला, विश्वम्भरपुर के द्वारा पुछा गया कि जहाँ विलम्ब से धान की रोपनी की जा रही है वहाँ धान के पैदावार पर क्या अगर पड़ेगा। इस प्रश्न पर वरीय वैज्ञानिक-सह-प्रधान, कृषि विज्ञान केन्द्र, सिरिस, औरंगाबाद के द्वारा बताया गया कि विलम्ब से रोपनी होने पर पैदावार में बहुत ज्यादा गिरावट होता है तथा इस परिस्थिति में जाईम का प्रयोग करने से धान के उत्पादन में थोड़ा-बहुत वृद्धि होता है। जिन क्षेत्रों में धान की रोपनी नहीं हुई है वहाँ किसान राई, मक्का, अरहर, तील इत्यादि के फसल का उत्पादन कर सकते हैं जिसका बीज कृषि विभाग द्वारा उपलब्ध कराया जा रहा है।

 

बारून प्रखंड के ग्राम नदिआईन के गुप्ता पासवान के द्वारा पुछा गया कि धान की रोपनी के बाद सितम्बर माह में धान के पौधे में कौन रोग लग जाता है जिससे धान का पौधा सुख जाता है। डा0 नित्यानन्द के द्वारा जानकारी दिया गया कि धान की रोपनी के बाद धान में दो प्रकार का कीट लगता है हरा मधुआ एवं भुरा मधुआ जो तना से रस चूस जाता है जिसके लिए इमिडाक्लोरोपीड 150 मी0ली0/बीधा एवं 150 मी0ली0 स्टीकर के साथ प्रयोग धान फसल में तुरन्त लाभदायक होता है। किसान श्री बलराम सिंह के द्वारा पुछा गया कि प्राकृतिक के अनुकुल परिस्थितियों से जुझ रहे किसानों को अपने खेतों में क्या परिवर्तन करने की आवश्यकता है। इस संदर्भ में वैज्ञानिक के द्वारा बताया गया कि किसानों को कम अवधि का फसल लेना चाहिये जैसे- धान का साकेत-1 एवं साकेत-5 जैसा प्रभेद जो कि 105 से 110 दिनों के अंदर उगाई जाती है, उसे अपनायें।

 

प्रखण्ड देव के किसान चंद्रदेव यादव के द्वारा पुछा गया कि चना एवं मसूर का फसल एक महिने के बाद पौधा सूखने लगता है एवं पौधा मर जाता है। इस संदर्भ में वैज्ञानिक ने यह बताया कि इसके लिये निम्न कारण होता है-

(1). पौधे में 10-12 दिन के बाद फ्यूजेरियम विल्ट लगता है जिसके कारण पौधा काला होकर सुखता है।

(2). खेत में दीमक का प्रकोप के वजह से

(3). ज्यादा नमी होने के वजह से पौधा सुखता है। उक्त समस्याओं का सामाधान के लिये मृदा का फफुंदीनाशक ट्राईकोडरमा विरिडीह 2.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर से करें, बीज का उपचार फंगीसाइड कार्बेंडाजाईम, इनसेक्टीसाईड क्लोरोपाइरीफॉस एवं राइजोबीयम कल्चर से करें।

 

संवाद के दौरान जावेद आलम, सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण, औरंगाबाद के द्वारा धान में लगने वाले कीट एवं रोग प्रबंधन पर चर्चा की गई जिसके तहत निम्नलिखित बिमारी एवं कीट का प्रबंधन इस प्रकार है।

1. जिवाणु झुलसा रोग – इसमें पौधे के पतियां उपर से निचे की ओर सुखती है। जिसके निवारण के लिये स्ट्रेक्टोसाईकलीन (0.015%) का मिश्रण छिड़काव करें।

2. शिथबलाईट(अंगमारी झुलसा रोग) एवं शिथरोट(गांठ सड़न रोग)- इसका निदान वैलिडामाईसिन 2उस प्रति लीटर एवं मैनकोजेब 75% SP 2.0 ग्राम प्रति लिटर पानी में क्रमशः छिड़काव करें।

3. इस अवसर पर जिला कृषि पदाधिकारी-सह-परियोजना निदेशक, आत्मा, औरंगाबाद श्री रणबीर सिंह, वरीय वैज्ञानिक-सह-प्रधान, कृषि विज्ञान केन्द्र, डा0 नित्यानन्द, कृषि वैज्ञानिक डॉ अनुप चौबे, सहायक निदेशक, पौधा संरक्षण श्री जावेद आलम, उप परियोजना निदेशक, श्री शालिग्राम सिंह एवं अन्य विभागीय पदाधिकरियों के द्वारा उपस्थित किसानों से वार्त्तालाप कर उनकी समस्याओं का निराकरण किया गया।

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