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जयप्रकाश जयंती (11 अक्तूबर )पर विशेष,पत्रकारिता के संत सुरेंद्र किशोर सर के फेसबुक वॉल से

जेपी आंदोलन में कई वैसे गृहस्थ भी जान हथेली पर लेकर सक्रिय हुए थे जो सन 1977 में सरकार बनने के बाद फिर अपने पुराने जीवन में लौट गए।सत्ता में अपनी किसी तरह की छोटी-बड़ी सहभागिता के लिए लालायित होने का उनका स्वभाव ही नहीं था। यह था जेपी का ही चमत्कार था

सुरेंद्र किशोर


डा.राममनोहर लोहिया ने जेपी से ठीक ही कहा था कि
‘‘इस देश को तुम ही गरमा सकते हो।’’ तब जेपी भूदान और सर्वोदय आंदोलन में थे।लोहिया चाहते थे कि जेपी सक्रिय राजनीति में आएं।उन्हीं दिनों इसी आशय की मेरी एक चिट्ठी सुरेंद्र अकेला के नाम से ‘‘दिनमान’’ में छपी थी जिसका शीर्षक था-‘‘लौट आओ जयप्रकाश’’।

खैर, जेपी को जब आना था,तभी आए सक्रिय राजनीति में।
पर जब आए तो उन्होंने आम लोगों पर भी ऐसा प्रभाव डाला कि मत पूछिए।कई वैसे स़्त्री-पुरुष भी आंदोलन और इमरजेंसी के खिलाफ खतरा भरे भूमिगत आंदोलन में कूद पड़े जो राजनीति में नहीं थे।सन 1977 में सरकार बनने के बाद भी वे सत्ता की किसी छोटी-बड़ी कुर्सी के लिए लार नहीं टपकाई।

 

वैसे लोगों में हम पति-पत्नी भी रहे जिनके बारे में राकेश कुमार ने अपनी चर्चित पुस्तक ‘‘लोकराज के लोकनायक’’(नेशनल बुक ट्रस्ट)में एक छोटा अध्याय लिखा है।उस विवरण को जेपी के जन्म दिन पर एक बार फिर यहां पेश कर रहा हूं।इस संदेश के साथ कि जब देश को आपकी जरूरत हो,तो आंदोलन में अपना जीवन दांव पर लगा दीजिए।अगर उस आंदोलन के कारण सत्ता मिलती है तो उसकी मलाई की ओर ललचाई नजरों से मत देखिए।

हम पति-पत्नी (यानी, सुरेंद्र किशोर और रीता सिंह)क्रमशः सन 1974-75 के जेपी आंदोलन और 1975-1977 के आपातकाल के दौरान अपने -अपने ढंग से अलग -अलग सक्रिय रहे थे।इस पूरे विवरण को पढ़िएगा तो पाइएगा कि हम दोनों अपनी जान हथेली पर लेकर ही वह काम कर रहे थे।पर, सन 1977 में केंद्र और बिहार में जनता सरकारें बन जाने के बाद हमने किसी ‘‘परसादी’’ के लिए पलट कर भी नहीं देखा।
हम अपने -अपने काम में हम लग गए।पत्नी शिक्षिका बन गईं और मैं पेशेवर पत्रकारिता से मजबूती से जुड़ गया।

हमने आंदोलन-आपातकाल ( भूमिगत अभियान) में अपनी सहभागिता की न कभी सराहना चाही और न ही किसी प्रकार के ‘मुआवजे’ की चाह रखी।पर, अब जब वे बातें पुस्तक में समाहित हो चुकी हैं तो सोचा कि फेसबुक वाॅल पर आपसे भी साझा करूं।

 

इस पुस्तक के लेखक राकेश कुमार जब हमसे मिले थे तो प्रारंभिक हिचक के बाद हमने वह सब उन्हें बताया जो भूमिकाएं हमने निभाई थीं और हमारे साथ उन दिनों जो कुछ घटित हुआ था।तब की कुछ घटनाओं से आपको कुछ अचरज हो सकता है।

राकेश कुमार की पुस्तक ‘‘लोकराज के लोकनायक ’’
का प्रकाशन प्रतिष्ठित संस्था ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ ने किया है।
याद रहे कि राकेश कुमार ने जयप्रकाश नारायण पर लीक से हट कर लिखी इस किताब को तैयार करने में प्राथमिक स्त्रोत को आधार बनाया है।ऐसे पात्रों को लिया गया है जो पहले अधिक चर्चित नहीं हुए थे।इस पठनीय पुस्तक में तो और बहुत सारी बातंे हैं।पर, उसमें हमारे बारे में थोड़े में जो कुछ लिखा गया है,उसे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

पुस्तक का अध्याय-16

जब जेपी पर दागे गए आंसू गैस के गोले

राकेश कुमार

चार नवंबर,1974 को पटना में घेराव और प्रदर्शनों के पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के कारण पूरे शहर को छावनी में तब्दील कर दिया गया था।चारों तरफ केंद्रीय रिजर्व पुलिस के जवान तैनात कर दिए गए थे।सुरक्षा का ऐसा चाक -चैबंद ,व्यवस्था की गई थी कि आंदोलनकारी सड़क पर निकल ही नहीं पाएं,किंतु अकसर होता यह था कि आंदोलनकारियों के जोश-जुनून के आगे सरकार की पूरी तैयारियां धरी की धरी रह जाती थीं।
चार नवंबर को जेपी के नेतृत्व में मंत्रियों और विधायकों के आवासों को घेरने के लिए महिला आंदोलनकारियों ने भी मन बना लिया था।

 

किंतु पुलिसिया सख्ती सुरसा की तरह मुंह खोले निगलने को खड़ी थी।लेकिन इन महिला आंदोलनकारियों का जुनून हनुमान -सुरसा संघर्ष की तरह था। जिसमंे बजरंगबली सुरसा के मुंह में घुस कान से निकल कर सीता मैया की खोज में लंका की तरफ आगे बढ़ जाते हैं।छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की सक्रिय सदस्य रीता बताती हैं कि चरखा समिति से जुड़ी हम लड़कियों ने पुलिस को चतुराई से छका कर जेपी के नेतृत्व में चार नवंबर के प्रदर्शन में शामिल होने की रणनीति बना ली थी।

 

हुआ यूं कि 3 नवंबर की रात्रि में हमलोग खाने का व अन्य सामान लेकर कदम कुआं स्थित चरखा समिति पहुंच गए थे।
4 नवंबर को गंगा स्नान के बहाने महिलाओें का जत्था पैदल ही छोटी -छोटी टुकड़ियों में गांधी संग्रहालय पहुंच गए।
4 नंवबर को जेपी तकरीबन 10 बजे गांधी मैदान पहुंचे और वहां से आगे बढ़े।उनके साथ आंदोलनकरियों का हुजूम भी विधायक मंत्री आवास की ओर बढ़ा।इस दौरान हम महिलाओं का जत्था भी लाला लाजपत राय मार्ग से छज्जु बाग की तरफ से होते हुए जेपी के नेतृत्व वाले जुलूस से जा मिले।
(जारी)

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