विचार

सुधार की प्रक्रिया-एक आलेख

ज्ञानेंद्र मोहन खरे

आलेख। कहते है मानव जीवन सुधार की अनंत कड़ी है। अगर जीवन के हर लम्हे का लुफ़्त उठाना है तो सुधार की प्रक्रिया की निरंतरता बनायी रखनी होगी। मनुष्य ग़लतियों का पुतला है, पग पग पर गलती करता है और उसकी जीवन शैली में समय समय में सुधार अति आवश्यक है। सुधार की प्रक्रिया कोई जन्मजात हुनर नहीं है। इसे जीवन में लागू करना एक सहज और जटिल प्रक्रिया है। सहज इसलिए कि अगर इंसान जीवन में ईमानदार और पारदर्शी रहे और सुधार की महत्ता को अपने अहम पर वरीयता दे तो सफ़र आसान है। जटिल इसलिए कि व्यक्तिगत अहम को दरकिनार करना या सीमित अहमियत देना बेहद मुश्किल कार्य है।

 

ज़्यादातर इंसानो को यह पता नहीं चलता की कब उनकी आत्म सम्मान की रक्षा करने की प्रवृति विनाश के लिए उत्तरदायी अहम में तब्दील हो चुका है।

 

मानव जीवन तो अनमोल है। बिरले होते है जिन्हें परम पिता का यह आशीर्वाद नसीब होता है। इस शुभ और पुनीत अवसर को व्यर्थ ज़ाया करना अति मूर्खतापूर्ण कृत्य है। इसे सुखमय और सार्थक बनाना सभी की ज़िम्मेदारी है। समय गतिमान है और सही वक़्त पर जीवनशैली में अगर सुधार न किया गया तो ज़िंदगी दोज़ख़ बन जाती है। जीवन का सम्पादन आनंदित, पुष्पित और सुरभित ढंग से करना ही श्रेयस्कर है। कार्यशैली के सुधार में बड़े बुजुर्गों और समाज की विशेष भूमिका होती है। सुधार मुख्यतः तीन स्थितियाँ होते है-
1. स्वयं सुधार
2. अनुकरण या रूपांतरण
3. हालातों का असर।
सुधार की उपरोक्त तीनो स्थितियाँ जीवन में क्रमशः आती है।

 

स्वयं सुधार का मतलब हे कि आत्म विश्लेषण के द्वारा सुधार। स्वयं से स्वयं को चुनौती और उत्साह और जोश से लक्ष्य हासिल करना।यह एक आदर्श स्थिति होती है, चूँकि सुधार की आदत जन्मजात प्रतिभा नही होती।

 

इसलिए बचपन से अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्य देना अभिभावकों और संरक्षकों की ज़िम्मेदारी होती है। वे संस्कार जो बच्चे को पारदर्शिता और संवेदनशीलता से जीने को प्रेरित करे। सही ग़लत का फ़र्क़ समझने की क्षमता दे। सही निर्णय को सही तरीक़े जीवन शैली में आत्मसात् करने के लिये सक्षम बनाए। जिसने स्वयं सुधार के मायने भली भाँति समझ लिए उसे जीवन में कभी पछतावा नहीं होता। कभी कभी अच्छे संस्कार और नैतिक मूल्य भी स्वयं सुधार के लिए उत्साहित नहीं कर पाते है क्योंकि इंसान अपराध बोध से ग्रस्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में मानसिक दृढ़ता बनाए रखना आवश्यक है।

 

जब स्वयं सुधार की प्रक्रिया प्रभावी न रहे तो अनुकरण या रूपांतरण की प्रक्रिया से सुधार किया जाता है। इसमें वो स्थितियाँ उत्पन्न की जाती है जो सुधार की प्रक्रिया शुरू करने के लिए बाध्य करती है। साथ ही अवश्यम्भावी कष्ट और तनाव से भी रूबरू कराया जाता है।

 

सामान्यतः यह प्रक्रिया अभिभावक किशोर उम्र के बच्चों को सुधारने के लिए प्रयोग में लाते है। मसलन अगर कोई बच्चा समय पर भोजन न करता हो तो इस आदत से उसे शारीरिक अस्वस्थता हो सकती है। सुधार की लिए अभिभावकों को समय अवधि के पश्चात भोजन हटा देना ताकि बच्चे को समय पर भोजन की महत्ता का एहसास हो जाए। जब गलती का अहसास हो जाए तो बाद में फ़िर भोजन देना। इससे घटना से उसकी लापरवाही में सुधार होने की पूरी गुंजाइश है। इस प्रक्रिया का सटीक प्रयोग अत्यंत प्रभावी होता है और समयानुसार सुधार प्रक्रिया अनवरत जारी रहती है।

 

हालातों के असर से सुधार प्रक्रिया चालू होना अत्यंत भयावह स्थिति को अंजाम देता है। उपरोक्त उदाहरण में यदि भोजन समय के अनुसार लेना है। यह सुधार अगर हालातों के असर से हुआ तो अति कष्टप्रद होगा।

 

 

क्योंकि आपको उस समय भोजन नसीब नही होगा जो मानसिक तनाव और परेशानी का कारण बन जाएगा। ऐसी स्थिति में इंसान कभी कभी अनैतिक और ग़ैरक़ानूनी कार्य करने के लिए मजबूर हो जाता है। और पथ भ्रष्ट हो पतन के मार्ग पर अग्रसर हो जाता है।सुधार की प्रक्रिया जीवन को सुखमय बनाने के लिए लाज़मी है। इसका समयानुसार क्रियाँवन ही जीवन में सुकून लाएगा। सभी को हालातों के असर के बाद सुधार की आदत से बचना चाहिए। याद रहे जीवन मे अपनी कार्यशैली में सुधार स्वयं को अपनाना है। यह तभी सम्भव है जब सुधार की महत्ता समझ आ जाए। अहम और आत्मसम्मान में फ़र्क़ समझ में आ जाए।

 

अपने अहम को आत्म सम्मान की रक्षा तक सीमित रखना होगा। इंसान को जीवन पर्यन्त सीखने की ललक बनाए रखनी होगी। इंसान जितनी जल्दी स्वयं सुधार सीखेगा उसका जीवन उतना ही गौरवशाली होगा।

 

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