विचार

महारानी दुर्गावती की वीरता की कहानी

राकेश कुमार
आलेख। नर्मदा नदी की घाटी और वर्तमान मध्य प्रदेश का उत्तरी हिस्सा संयुक्त रूप से मध्यकालीन भारतीय इतिहास में गढ़कटंगा राज्य के नाम से जाना जाता था। इस गोंड राज्यक्षेत्र गढ़कटंगा के अधीन कुछ छोटे राजपूत सरदार व गोंड क्षत्रप भी शासन किया करते थे।
गढ़कटंगा को मध्यकाल में संगठित कर राज्य के रूप में स्थापित करने का श्रेय अमनदास को जाता है जिसे इतिहास के पन्ने ‘संग्रामशाह’ के रूप में याद करते हैं। हुआ यूं था कि गुजरात के राजा बहादुरशाह को रायसेन को जीतने में अमनदास ने काफी मदद की थी। इस अभियान के बाद बहादुरशाह को अपनी बहादुरी से कहीं ज्यादा अमनदास की बहादुरी पर फ़क्र हुआ था और इसने अमनदास को ‘संग्रामशाह’ की खिताब से नवाज़ दिया था।

 

 

संग्रामशाह ने अपनी ताकत के बल पर गढ़कटंगा को राज्य का स्वरूप प्रदान किया और अपनी स्थिति को और भी सुदृढ़ करने के लिए इसने अपने बड़े बेटे की शादी महोबा के चंदेल घराने की राजकुमारी दुर्गावती से कर दिया था। दुर्गावती की वीरता और रूप-लावण्य की कहानियां काफी चर्चित थी।राजकुमारी दुर्गावती अब गढ़कटंगा राज्य की राजरानी बन चुकी थी और उसका शादी-शुदा जीवन बहुत ही सुखमय चल रहा था। लेकिन नियति ने हिचकोले खाये और एक पुत्र की प्राप्ति के कुछेक साल बाद रानी दुर्गावती विधवा हो गई। उधर, श्वसुर संग्रामशाह की भी मृत्यु हो गई थी और इसके बाद उसके पति की भी। राजकुमारी ने धैर्य और बहादुरी का परिचय दिया।

 

 

रानी दुर्गावती ने नाबालिग बेटे को गद्दी पर बैठा दिया और राजकाज का संचालन सफलतापूर्वक संभाल लिया।रानी दुर्गावती को अपने अचूक निशाने पर जबरदस्त यकीन था। इसके तरकश से निकले वाण सीधे शिकार या दुश्मन को भेदा करते थे। वहीं, रानी के बंदूक की निशानेबाजी की भी खूब चर्चा थी। कहा तो यहां तक जाता है कि उसके एक बुलेट एक शत्रु के लिए पर्याप्त थे।रानी दुर्गावती शिकार की भी बेहद शौकीन थी। शेर के शिकार के उसके किस्से काफी चर्चित थे और जनता के जुब़ान पर हुआ करता था।इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि जब भी रानी दुर्गावती को अपने राज्यक्षेत्र में शेर के दिखाई देने की खबर प्राप्त होती थी, रानी बिना उसके शिकार के जल तक ग्रहण नहीं करती थी।

 

 

रानी दुर्गावती के अद्भूत सौंदर्य और गढ़कटंगा राज्य के धन-वैभव पर मुगलराज के इलाहाबाद के सूबेदार आसफ़ खाँ काफी समय से नज़र गड़ाये हुए था। बस, उसे केवल मौके की तलाश थी।सूबेदार आसफ़ खाँ तकरीबन दस हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ गढ़कटंगा राज्य पर कब्जे की नियत से बुंदेलखंड़ की ओर कूच किया। इधर, खबर मिलते ही रानी दुर्गावती भी मुकाबले के लिए तैयार हो गई थी। लेकिन एक बार फिर दुर्भाग्य ने दुर्गावती का पीछा किया।मौके का फायदा उठाते हुए गढ़कटंगा राज्य के अर्ध स्वतंत्र शासकों ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया और मुगलों से मुकाबले में रानी दुर्गावती का साथ नहीं दिया। एक छोटी सी सेना के साथ रानी दुर्गावती आसफ़ खाँ की सेना से जमकर मुकाबला करती रही।मुगलों की दस हजार घुड़सवार सेना के सामने रानी छोटी-सी सेना के साथ बहादुरी से मुकाबला करती रही किन्तु जैसे ही उसे अहसास हुआ कि अब वह मुगलों के गिरफ्त में आ सकती थी, वैसे ही उसने छुरा घोंपकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली।

 

 

रानी दुर्गावती के जीते जी आसफ़ खाँ गढ़कटंगा राज्य की राजधानी चौरागढ़(जबलपुर के निकट) पर अधिकार नहीं कर सका किन्तु रानी की मौत के बाद मुगलों की सेना ने चौरागढ़ को कब्जे में लिया। चौरागढ़ के किले से सूबेदार आसफ़ खाँ को अकूत दौलत हाथ लगा और इसी किले से रानी दुर्गावती की सगी छोटी बहन कमला देवी को भी बंदी बनाया गया।चौरागढ़ की अकूत संपत्ति को आसफ़ खाँ खुद दबा लेना चाहता था और दिखावे के लिए कुछ हिस्सा मुगल बादशाह अकबर को भेजना चाहता था। इसने लूट के माल से मुगल दरबार को केवल दो सौ हाथी भेजे थे। साथ ही, कमला देवी को भी मुगल दरबार के हरम में आसफ़ खाँ ने भेज दिया था।इतिहासकार अबुल फज़ल ने लिखा है गढ़कटंगा राज्य से लूटी गई संपत्ति को मुगल दरबार में समर्पित करने के लिए अकबर ने आसफ़ खाँ को बाध्य किया। वहीं, मालवा के सीमा पर स्थित दस दुर्गों को अकबर ने अपने अधीन लेकर गढकटंगा राज्य को संग्रामशाह के छोटे बेटे चंद्रशाह को वापिस कर दिया।

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