सम-सामयिक

बिहार सरकार अगर संज्ञान लेती तो गुमनामी की मौत नही मरते जुगनू शारदेय-रघुवर

संजय रघुवर,प्रदेश अध्यक्ष राष्ट्रवादी विकास पार्टी

औरंगाबाद। फेसबुक पर चर्चित पत्रकार श्री उर्मिलेश जी के आलेख से जानकारी मिली थी कि कभी समाजवादी आंदोलन में युवजन सभा के माध्यम से सक्रिय रहे तथा लोकनायक जयप्रकाश आंदोलन के प्रमुख स्तंभ रहे वरिष्ठ पत्रकार जुगनू शारदेय इस दुनिया में नहीं रहे। समाजवादी आंदोलन के जमाने के एवं देश के महान समाजवादी नेता श्री राज नारायण जी एवं जननायक कर्पूरी ठाकुर जी के निकटतम सहयोगी रहे श्री उदय भान जी ने मेरे व्यक्तिगत व्हाट्सएप पर समता मार्ग में प्रकाशित श्री श्रवण गर्ग जी का एवं श्री अनिल सिन्हा जी का आलेख मुझे भेजा।

 

 

आलेख पढ़कर मन में काफी वेदना हुई। जन्म और मृत्यु तो प्रकृति का शाश्वत नियम है जो आया है उसे एक दिन दुनिया से जाना है। पर जिन परिस्थितियों में स्वर्गीय जुगनू शारदेय की मौत हुई वह हृदय विदारक है। हृदय विदारक इसलिए है कि विगत वर्षों से स्वर्गीय जुगनू कैंसर की बीमारी से जीवन और मृत्यु से जूझ रहे थे। पिछले कुछ महीना पूर्व देश के वैचारिक पत्रकारों ने एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने बिहार के मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार जी को संयुक्त हस्ताक्षरित पत्र भेजकर यह आग्रह किया था कि श्री जुगनू के रहने के लिए एक सरकारी आवास तथा समुचित चिकित्सा की व्यवस्था की जाए।

 

 

लेकिन श्री नीतीश कुमार जी ने किसी भी प्रकार का संज्ञान नहीं लिया।यही कारण था कि स्वर्गीय जुगनू गढ़मुक्तेश्वर एक वृद्ध आश्रम में आश्रय लिए हुए थे। जहां सामाजिक कार्यकर्ता श्री राजेंद्र रवि यदा-कदा उनके संपर्क में थे। जब श्री राजेंद्र रवि ने किसी एक मित्र को स्वर्गीय जुगनू के हाल-चाल जानने के लिए वृद्धाश्रम में भेजा तो जानकारी दी गई कि उनकी मृत्यु हो गई है और उनका अंतिम क्रिया कर दिया गया है। मुझे पीड़ा इसलिए है कि आज पत्रकारिता के नाम पर ब्लॉक लेवल पर भी जो लोग काम करते हैं।उनके पास चार चक्के वाली गाड़ी होती है। उनका जीवन ऐसो आराम का होता है।

 

 

आज जब पंचायत का व्यक्ति मुखिया या फिर पंचायत समिति बनता है तो दूसरे ही दिन उसके दरवाजे पर स्कॉर्पियो गाड़ी आ जाती है। वही स्वर्गीय जुगनू जैसे लोग जो समाजवादी आंदोलन के जमाने में युवजन सभा के राष्ट्रीय कार्य समिति के सदस्य थे। वह डॉक्टर राम मनोहर लोहिया का जमाना था लोकनायक जयप्रकाश के नेतृत्व में चली आंदोलन के अग्रणी लोगों में एक थे। जिनके मित्रवत संबंध आज के सत्तापक्ष और विपक्ष के बड़े नेताओं के साथ थे। पत्रकारिता जगत में धर्मवीर भारती, गणेश मंत्री, रघुवीर सहाय जैसे लोगों से उनके मित्रवत संबंध थे।

 

 

महान कथाकार श्री फणीश्वर नाथ रेणु जैसे लोगों से उनके संबंध बेहद अच्छे एवं पारिवारिक थे। इसके बाद भी वह इतना भी साधन एकत्रित नहीं कर पाए कि वह कहीं आराम से कमरा में भी रह सके और उनके मरणोपरांत सम्मान के साथ अंत्येष्टि की क्रिया हो सके। निश्चित रूप से देश और समाज के लिए यह चिंता का विषय है कि चाहे राजनीति हो चाहे पत्रकारिता हो या साहित्य या कला का क्षेत्र हो अब वहां मानवीय संवेदना नहीं बची।

 

 

यदि मानवीय संवेदना होती तो ख्यातिलब्ध पत्रकार जुगनू शारदेय का दुखद अंत नहीं होता। यदि राजेंद्र रवि अपने किसी मित्र को वृद्धाश्रम में नहीं भेजे होते तो लोगों को जानकारी भी नहीं होती कि जुगनू अब इस दुनिया में नहीं रहे। मैं उनके निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त करते हुए श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Back to top button
You cannot copy content of this page