व्यंग्य

जब मैंने भी लोकतंत्र पर ऊँगली……

राकेश पांडेय

औरंगाबाद। लोकतंत्र की जड़ें जमीन तक पहुंचाने के लिए पंचायतीराज व्यवस्था आरंभ की गई थी किंतु कुछ ही समयावधि में लोकतंत्र को सतही बनाने और कमजोर करने में पंचायतीराज की भूमिका खुलकर सामने आ गया. लोकतंत्र के महापर्व चुनाव में पंचायत के प्रत्याशियों द्वारा धन और बाहुबल के प्रयोग ने लोकतंत्र के स्थायित्व व पवित्रता पर ऊँगली उठाने की स्थिति उत्पन्न कर दिया है.

 

कोई नोट पर वोट खरीदने का दंभ भर रहा है, तो कोई बाहुबल का जमकर प्रयोग कर रहा है………कहाँ तो यह आशा व्यक्त की गई थी कि पंचायतीराज संस्थाओं के आगमन के बाद लोकतंत्र में व्यापक जनभागीदारी होगी और ‘लोक’ (लोग) तंत्र में सबसे करीब से भागीदार बनेंगे, किंतु मामला उल्टा पड़ गया और लोकतंत्र का एक और अवरोध मुखिया, वार्ड आदि के रूप में माननीय बन बैठे. ….और लोक(लोग) फिर दरकिनार………

 

सूचना क्रांति के बाद त्वरित सूचनाओं के प्रवाह और सूचनाओं के बहु-आयामी प्रवाह(सूचनाओं का एकपक्षीय प्रवाह की स्थिति तब होती थी, जब सरकार के तंत्र ही सूचना स्त्रोत थे) ने त्वरित क्रिया-अनुक्रिया का दबाव बनाया है किन्तु संचिकाओं में उलझा मंत्री-अधिकारी संवर्ग व लोकशाही की पद्धति से अभी कोसों दूर राजशाही प्रवृति को आत्मसात कर चुका नौकरशाही लोगों की अपेक्षाओं से कोई तालुक़ात रखने को राजी नहीं है.

 

“त्वरित अपेक्षा और विलंबित/ शिथिल अनुक्रिया की स्थिति कुछ ही दशकों में लोकतंत्र को चुनौती पेश करेगा और इसमें सुधार(Reform) के लिए या तो बाध्य करेगा या घनघोर संघर्ष की स्थिति पैदा करेगा”, ऐसा मेरा मानना है या मेरा दावा है.लोकतंत्र की इस दयनीयता की स्थिति पर मैंने भी उँगली उठा दिया है;आप फोटो में देख सकते हैं………

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