लघु कथा

गूगल बाबा-ज्ञानेंद्र मोहन खरे

ज्ञानेंद्र मोहन खरे

लघु कथा। घड़ी के अलार्म की तेज ध्वनि ने ज्ञानू जी के साथ घर के अन्य सदस्यों की नींद में अवरोध उत्पन्न कर दिया था। राजू लेटे लेटे बड़बड़ाया पापा भी ना अपनी ज़िद में अड़े रहते है। कितनी बार बताया की मोबाइल में कोई मधुर ध्वनि का अलार्म लगा लीजिए पर समझते ही नहीं। उसने करवट ली और चद्दर से मुँह ढाँक सोने का प्रयास करने लगा। सूर्य देवता प्रचण्डता की ओर अग्रसर थे और ज्ञानू को राजू का सोना नागवार लग रहा था।

 

ज्ञानू जी अब तक चेतन्त हो गए थे। अपनी ऐनक पहन वे बाथरूम की तरफ़ चल पड़े। राजू और ज्ञानूजी के विचारों में विरोधाभास अब दिनचर्या का अंग बन चुका था। राजू की अस्त व्यस्त जीवन शैली से ज्ञानू और राजू की मम्मी बेहद परेशान थे।उसके व्यवहार में परिलक्षित अड़ियल पन सभी की चिंता का सबब बन चुका था। अनुशासन का अभाव राजू के जीवन में कष्ट और तनाव को अवश्यंभावी बना रहा था।

 

राजू सोलह वर्ष का दुबला पतला आकर्षक किशोर था जिसे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने का जुनून था। पर अनुभव और दुनियादारी जीवन में कितनी ज़रूरी है इस बात का इल्म उसे नहीं था।राजू तो गूगल बाबा के चंगुल में फँस चुका था। उसे अपने सर्वज्ञाता होने की ग़लतफ़हमी हो गयी थी। उसे लगता गूगल में हर समस्या हल मौजूद है। मेहनत से वो जी चुराने लगा था और समस्या का समयानुसार हल कर कार्यशैली में सुधार करना उसे फ़िज़ूल और बेमानी लगता। समय की अहमियत उससे लगातार नज़रंदाज़ हो रही थी।

 

राजू की परीक्षा निकट थी। कोरोना के कारण स्कूल में कक्षायें नियमित नहीं थी और परीक्षा प्रणाली प्रभावित होने की पूरी सम्भावना थी। राजू को बारम्बार ताकीद किया जा रहा था कि अपनी तैयारी स्कूल में जाकर परीक्षा देने के हिसाब से करे। जनरल प्रमोशन को नियति मान ना चले पर राजू गूगल बाबा से कोरोना प्रचार प्रसार की जानकारी लेने में व्यस्त था। कोरोना के नए वेरीयंट आने से मन ही मन ख़ुश होता। अंतोगतवा वही हुआ जिसका सभी को डर था। वार्षिक परीक्षा स्कूल में होगी की जानकारी स्कूल प्रबंधन ने दी। समय कम बचा था और अच्छे नम्बरों से पास होना चुनौतीपूर्ण लक्ष्य बन गया था।

 

राजू ने गूगल बना को खंगाला पर गूगल बाबा के पास कम समय में ज़्यादा तैयारी करने का रेडीमेड हल नहीं था।राजू अत्यंत तनाव ग्रसित था। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया और उसकी तबियत अक्सर ख़राब होने लगी। क्या करना है उसे समझ नहीं आ रहा था। वो अनजाने में हुई गलती के अपराध बोध से दबा जा रहा था। अगर परीक्षा में बेहतर परिणाम नहीं आए तो अच्छे स्कूल में दाख़िला नहीं मिलेगा। उसकी मानसिक स्थिति इतनी खराब हो गयी कि एक दिन राजू चक्कर खा कर गिर गया और अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ गयी।

 

ज्ञानू जी ने वस्तुस्थिति की गम्भीरता को समझा और त्वरित निर्णय लेटे हुए उसे सारे विषयों की ट्यूशन लगा दी। राजू ने आदतन असहमति दिखाई पर ज्ञानू जी ने अनसुना किया। अनुभवी शिक्षकों की देखरेख में समयबद्ध तैयारी से राजू को मानसिक संबल मिला। उसका आत्मविश्वास बढ़ा। नतीजन वार्षिक परीक्षा में परिणाम अच्छे रहे और उसे शहर के सर्वोत्तम स्कूल में दाख़िला मिल गया।

 

अब राजू को समय की महत्ता समझ आ गयी थी। उसे यह भी समझ आ गया था कि गूगल बाबा के पास अनुभव और दुनियादारी सिखाने का साधन और यंत्र नहीं है। सफलता का कोई शॉर्टकट नही है। गूगल बाबा अब उसकी प्राथमिकता नहीं रहे। राजू की सोच में आए बदलाव से परिवार के सभी लोग अत्यंत प्रसन्न थे और राजू भी निर्मल आनंद से ओतप्रोत था।

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