इतवारी खास

इतवारी खास-जेपी का समाजवाद और जन आंदोलन में शेखोदेउरा आश्रम की भूमिका

राकेश कुमार(लेखक, लोकराज के लोकनायक)

इतवारी खास। सन 1954 की बात है। बोधगया में सर्वोदय सम्मेलन चल रहा था। इस सम्मेलन में जेपी ने 19 अप्रैल को घोषणा की, “भूदान आंदोलन के प्रति मेरी श्रद्धा दिनों दिन बढ़ती जा रही है और यह एक ऐसा आंदोलन है जिसमें कुछ साल देने से काम नहीं चलेगा। बल्कि आज मैं इस आंदोलन के लिए जीवनदान कर रहा हूँ और आपसे भी आह्वान करता हूँ कि आप भी ऐसा करें।“ 30 मार्च, 1954 को डॉ राम मनोहर लोहिया ने जेपी को पत्र लिखा था…

प्रिय जयप्रकाश,
देश और पार्टी को हिलाने का समय आ रहा है और जैसा तुम हिला सकते हो, वैसा और कोई नहीं हिला सकता है। तुम्हीं देश के नेता हो सकते हो और समाजवाद को बढ़ा सकते हो।
तुम्हारा
राम मनोहर लोहिया

प्रत्युत्तर में जेपी ने लोहिया को लिखा….

प्रिय राम मनोहर लोहिया,

इस समय मेरे मन में जो विचार हैं, उसे जानते हुए तुम्हें यह प्रस्ताव करना ही नहीं चाहिए था। देश को हिलाने की शक्ति न मुझमें कभी थी, न आज है। न उस प्रकार हिलाने का मेरे पास बहुत महत्व ही है।……मुझे भी पार्टी का ‘चवन्नी’ का सदस्य बनकर ही रहना होगा।

जयप्रकाश

जेपी ने भूदान के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा कि छिछली निगाह से देखने वालों के लिए भूदान केवल एक कृषि सुधार का आंदोलन है जो लोग भूदान को गहराई में जाकर देखते हैं उनके लिए भूदान सम्यक् सामाजिक और मानवीय क्रांति की शुरुआत है। इसका लक्ष्य समाज के साथ-साथ मनुष्य में भी परिवर्तन लाना है। यह महात्मा गांधी की अहिंसक क्रांति की प्रक्रिया का सामान्य स्तर पर किया जाने वाला प्रयोग है।
शेखोदेउरा आश्रम
जीवनदान की घोषणा के बाद जेपी ने ग्रामीण पुनर्निर्माण संबंधी अपने विचारों को अंजाम तक पहुंचाने के लिए बिहार के अत्यंत पिछड़े क्षेत्र के चुनाव का मन बनाया। तत्कालीन गया जिले के कौआकोल प्रखंड के शेखोदेउरा निवासी स्वतंत्रता सेनानी उग्र नारायण सिंह भी बोधगया के सर्वोदय सम्मेलन में शिरकत करने पहुंचे हुए थे। जीवनदान की घोषणा के बाद उग्र नारायण सिंह ने जेपी को कौआकोल प्रखंड में आश्रम स्थापित करने का सुझाव दिया क्योंकि यह क्षेत्र बिहार के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता था।

जेपी ने कौआकोल प्रखंड का भ्रमण किया। परसौनी टांड के पास पचंभा गांव जेपी को, तो शेखोदेउरा ग्राम प्रभावती को आश्रम स्थापित करने के लिए पसंद आया। जेपी ने प्रभावती के पसंद को प्राथमिकता दी। जेपी और उग्र नारायण सिंह ने मंडरा महंथ और बुधौली महंथ से आश्रम स्थापित करने के लिए भूदान की अपील की। महंथ ने आश्रम के लिए जमीन दिये।जेपी मगध प्रमंडल में भूदान यात्रा के क्रम में ग्रामीणों को बताया करते थे कि जमीन मांगकर और भूमिहीनों के बीच बांटकर उनके बीच रहते हुए नवनिर्माण में उनकी सहायता करेंगे।


5 मई, 1954 को तत्कालीन गया जिले के नवादा अनुमंडल के कौआकोल प्रखंड के ग्राम शेखोदेउरा में ग्राम निर्माण मंडल, सर्वोदय आश्रम की नींव डाली गई। अब जेपी ग्रामीणों के बीच रहकर उनके नवनिर्माण के कार्य में जुटने को संकल्पित हुए।
भूदान आंदोलन से जुड़े लगभग एक सौ युवक और अनुभवी कार्यकर्ताओं के साथ लगभग 77 एकड़ में आश्रम की स्थापना की गई। आश्रम के संचालन के लिए ग्राम निर्माण मंडल नामक स्वयं सेवी संस्था का पंजीकरण सोशायटी रजिस्ट्रेशन एक्ट,1860 के अधीन करवाया गया।

 

सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में रुचि रखने वाले खादी प्रेमियों की 15 सदस्यीय नियामक समिति को इस संस्था के संचालन का जिम्मा दिया गया। संस्था के कार्यों को सुचारू रूप से संचालित करने के लिए प्रत्येक तीन वर्ष पर अध्यक्ष, कोषाध्यक्ष, प्रधानमंत्री, मंत्री और उसके सदस्यों का चयन किया जाने का प्रावधान किया गया। साथ ही, प्रत्येक विभाग के संचालन के लिए संस्था द्वारा अलग से समिति और पदाधिकारियों को मनोनीत करने का अधिकार प्रदान किया गया।

इस संस्था के मुख्य विभाग- खादी ग्रामोद्योग, कुष्ठ सेवा, लघु सिंचाई, खादी ग्रामोद्योग विद्यालय, कृषि विज्ञान केन्द्र और जिल उद्योग केन्द्र, (गया) है। खादी ग्रामोद्योग विद्यालय की स्थापना 1956-57 में आश्रम परिसर में हुई जिसमें हरेक वर्ष तकरीबन 70 विद्यार्थियों को प्रशिक्षण 12 प्रशिक्षकों द्वारा दिया जाता था जिसके पहले प्राचार्य यमुना प्रसाद सिंह रहे और छठे व अंतिम प्राचार्य बलराम शास्त्री थे। इस विद्यालय में 10 महीने का प्रशिक्षण पाठ्यक्रम संचालित होता था जिसमें चार महीन कताई, चार महीने बुनाई और दो महीने क्षेत्रीय प्रशिक्षण की व्यवस्था थी। गांधी के सपनों को साकार करने की दिशा में प्रयासरत यह विद्यालय अब बंद है।

 

जेपी की इच्छा थी कि शेखोदेउरा आश्रम बहिर्मुखी बने और रचनात्मक कार्य में संलग्न कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण स्थल बने। ग्राम निर्माण मंडल, शेखोदेउरा आश्रम की स्थापना के उद्देश्यों को जेपी ने इस रूप में निर्धारित किया- सत्य और अहिंसा के आधार पर शोषणमुक्त व भयमुक्त समाज का निर्माण करना जिसमें ग्राम जीवन सुखद, स्वस्थ, सुसंस्कृत, स्वतंत्र और स्वावलंबी बन सके और मनुष्य के जीवन मूल्यों में ऐसा परिवर्तन लाने का प्रयत्न करे जिससे व्यक्तिगत हित लोकहित से और भौतिक आकांक्षाएं आध्यात्मिक प्रेरणाओं से पोषित हो।

 

उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ग्राम निर्माण मंडल, शेखोदेउरा आश्रम ने अखिल भारत सर्व सेवा संघ द्वारा मान्य कार्यक्रमों को जमीन पर उतारने का फैसला लिया। लोक स्वराज्य की स्थापना के लिए भूदान-ग्रामदान, संपत्तिदान, शांति सेना, गोरक्षा, सूतांजलि, शांति पात्र और लोक शक्ति संगठन के लिए लोक समिति व ग्राम सभा के गठन को बढ़ावा देने के कार्यक्रमों पर जोर दिया गया।ग्राम निर्माण मंडल, शेखोदेउरा आश्रम के द्वारा कृषि-गोपालन के विकास, सिंचाई प्रबंध, खादी ग्रामोद्योग के विकास व प्रसार, कुष्ठ निर्मूलन, आरोग्य कार्य संचालन, शिक्षा का प्रसार व प्रशिक्षण, नशाबंदी, हरिजन व आदिवासियों के उत्थान, ग्रामीण कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन, सहकारिता आंदोलन को बढ़ावा देने समेत ग्राम समस्याओं के संबंध में शोध में सहभागिता निभायी जा रही है।

 

जेपी की प्रेरणा से ग्राम निर्माण मंडल राष्ट्र के पुनर्निर्माण में गांव को प्राथमिक ईकाई मानकर ग्रामीणों को ग्राम सभा एवं लोक समिति के माध्यम से संगठित करने के कार्य में संलग्न रहा था। लोक स्वराज्य के सपने को साकार करने के उद्देश्य से आश्रम आरंभ में भूमि के बंटवारे और उसके व्यक्तिगत स्वामित्व के विर्सजन जनता को समझा-बुझा करने में कामयाबी पायी। इस कार्य में गया प्रमंडल में भारी सफलता मिली। यहां एक लाख पचहतर हजार पांच सौ सनतावन एकड़ भूमि आश्रम को भूमिदान से प्राप्त हुई जिसमें एक लाख पच्चीस हजार पांच सौ अड़सठ एकड़ भूमि तकरीबन सोलह हजार भूमिहीनों के बीच बांटी गई। जेपी की प्रेरणा से भूमिदान की यह परंपरा मगध प्रमंडल के औरंगाबाद में 1980 के दशक में महुआदान तक पहुंची।

औरंगाबाद में महुआदान की कहानी अगले इतवारी खास में प्रस्तुत किया जाएगा।

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