इतवारी खास

इतवारी खास-गांवों के पुनर्निर्माण का केंद्र था जेपी द्वारा स्थापित सेखोदेउरा आश्रम

जेपी ने अनोखे तरीके से बीडीओ को सिखाया सदाचार का पाठ

राकेश कुमार(लेखक-लोकराज के लोकनायक)

इतवारी खास।जेपी द्वारा स्थापित सेखोदेउरा आश्रम ग्रामीणों को सशक्त करने का सशक्त माध्यम बना। इसे एक वाक्या से समझा जा सकता है।1960 के दशक की बात है। जेपी गांवों के पुनर्निर्माण के लिए आश्रम के आस-पास गांवों में ग्रामीणों के बीच हुआ करते थे। गायघाट गांव में जेपी ने आदिवासी परिवारों से मुखातिब होते हुए कहा था कि आपके प्रखंड के तमाम अधिकारी आपके सेवक हैं। सरकारी योजना की जानकारी व समस्या की स्थिति में आपलोग सीधे बीडीओ साहेब से संपर्क किया कीजिए। एक दिन की बात गांव का एक व्यक्ति बीडीओ से मिलने कौआकोल प्रखंड कार्यालय पहुंचा। उस व्यक्ति से बीडीओ साहेब ने न तो सीधे मुंह बात की और न ही कार्यालय में बैठने को ही कहा।

 

वह व्यक्ति प्रखंड कार्यालय से सीधा जेपी के पास आश्रम पहुंचा। उसने जेपी से कहा, “तु तो कह हलहो कि बीडीओ तोर सेवक हकई। आज गेलिओ तो बैठहुल नय़ कहलको।“(जेपी, आप तो बोले थे कि बीडीओ समेत सारे पदाधिकारी आपलोगों के सेवक हैं लेकिन आज कार्यालय जाने पर बीडीओ साहेब ने बैठने के लिए भी नहीं कहा।)

जेपी ने बीडीओ साहेब को आश्रम में आकर मिलने का संदेश भिजवाया। संदेश पाते ही पहले तो बीडीओ साहेब की बेचैनी बढ़ी, फिर लगा कि संत के दर्शन का सुख प्राप्त होना लिखा है, इसलिए जयप्रकाश नारायण जी का संदेश आया है।बीडीओ साहेब, अगले दिन सुबह सात बजे शेखोदेउरा आश्रम में जेपी निवास पहुंचे। जेपी ने बड़े ही सत्कार से बीडीओ साहेब को खुद कुर्सी देकर बैठने को कहा। दोनों में बातचीत शुरू हुई। इसी क्रम में जेपी ने बीडीओ साहेब से कहा, “अगर आपके घर कोई गरीब अतिथि आ जाए, तो आपका क्या फर्ज बनता है? बैठने के लिए तो उसे कहेंगे ना!” बीडीओ साहेब ने सहमति में सिर झुकाया। बीडीओ साहेब के दिमाग में कल की घटना तैरने लगी।

 

जेपी ने कहा, “कल कोई एक गायघाट का आदिवासी लड़का आपके कार्यालय गया था? आपने उसे बैठने को क्यों नहीं कहा, साहब? अगर आप उसे अदब से बैठने को कह ही देते तो, आपकी कौन सी प्रतिष्ठा घट जाती?”बीडीओ साहेब, शर्म से गड़े जा रहे थे। उन्हें अपनी गलती पर पश्चाताप हो रहा था। मन में ग्लानि का भाव था।

 

…….”जेपी, आगे से ऐसा नहीं होगा, मुझे मांफ कर दीजिए। मैं कौन होता हूँ माफ करने वाला, भाई?” ,जेपी ने बीडीओ साहेब से कहा।आश्रम से निकलने के बाद बीडीओ साहेब गायघाट में उस आदिवासी परिवार के घर गये और उससे माफ करने की गुजारिश की। लोग बताते हैं कि इसके बाद से जेपी के जीवित रहने तक नवादा के हरेक कार्यालयों में जनता-जनार्दन के लिए कुर्सी की व्यवस्था की गई।सरकार द्वारा ग्रामीण उद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक जिले में उद्योग केन्द्र की स्थापना की गई थी। इस क्रम में जेपी की देख-रेख में जिला उद्योग केन्द्र, गया का संचालन ग्राम निर्माण मंडल, सर्वोदय आश्रम, सेखोदेउरा को सौंप दिया गया। वर्तमान में जिला उद्योग केन्द्र, गया की स्थिति राज्य के शेष उद्योग केन्द्रों से बेहतर है।

ग्राम निर्माण मंडल, सर्वोदय आश्रम, सेखोदेउरा रचनात्मक और अहिंसक तरीके से सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन को धरातल पर उतारने में शुरुआती दिनों से ही संलग्न है। कौआकोल प्रखंड के अंतर्गत घुमंतू बिरहोर आदिवासियों को ग्राम झिलार तथा पावापुरी टोले में स्थायी तौर पर बसाया गया। इन्हें कृषि व संबद्ध कार्यों तथा ग्रामोद्योग में प्रशिक्षण प्रदान किया गया।

 

इसके अलावा समुचित शिक्षा की व्यवस्था की गई। यहां आवंटित भूखंडों में फलादार और इमारती पौधे लगाये गये। इनके पुश्तैनी धंधे रस्सी बांटने को जारी रखने के लिए शीशल का रोपन किया गया। छिक्का निर्माण के लिए पटसन की आपूर्ति की गई। इन परिवारों को चरखा चलाने का प्रशिक्षण देकर रेशम सूत कताई के कार्यों में लगाया गया। ग्राम झिलार में चालीस एकड़ भूमि में अर्जुन के बागीचे का विकास कर रेशम कीट पालन किया जा रहा है। इन सभी कार्यों में आदिवासी परिवारों की सहभागिता सर्वोपरि होती है।आश्रम परिसर में पोली सूत उत्पादन सह वस्त्र निर्माण ईकाई एवं प्रशिक्षण केन्द्र का संचालन किया जा रहा है।

 

यहां हरिजन और आदिवासी परिवारों को प्रशिक्षित किया जाता है। उनके द्वारा उत्पादित सूत का क्रय और उत्पादन हेतु कच्चे माल की व्यवस्था ग्राम निर्माण मंडल द्वारा किया जाता है।कौआकोल भ्रमण के दौरान लोगों से प्राप्त मंतव्य से जाहिर होता है कि सेखोदेउरा आश्रम की स्थापना इस अत्यन्त पिछड़े क्षेत्र में विकास के मरुद्यान के समान था।

 

वर्तमान में इस क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास में आश्रम का योगदान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में जरूर दृष्टिगोचर होता है।लोगों का मानना है कि कौआकोल क्षेत्र को सभ्य, सुसंस्कृत, आत्मनिर्भर और उन्नत बनाने में आश्रम की भूमिका महत्वपूर्ण रही है।

भूदान से महुआदान

जेपी परलोक गमन के काफी वर्षों बाद भी मगध की धरती पर जेपी की प्रेरणा कायम रही। इसी प्रेरणा का प्रतिफल था कि 1990 के दशक में मगध प्रमंडल(गया) के अंतर्गत औरंगाबाद जिला भूमिदान का अगला चरण महुआदान का साक्षी बना।
सन 1987 की बात है। औरंगाबाद जिले के नवीनगर प्रखंड के कालापहाड़ गांव से नक्सलियों ने गोपाल सिंह और कम्युनिस्ट लीडर सरयू सिंह का अपहरण कर हत्या कर दी थी। नक्सली हत्या का कारण बना था- 4000 महुआ के पेड़ों का बागीचा। महुआ बागीचा गांव के स्वर्ण जातियों का था जबकि महुआ से इस अत्यंत पिछड़े क्षेत्र में जीविकोपार्जन दलित परिवारों का होता था।

 

कालापहाड़ के ग्रामीण मृत्युंजय सिंह बताते हैं कि इस बागीचे से तकरीबन 400 मन महुआ का उत्पादन होता था।1990 में महुआ के बागीचे पर जीविकोपार्जकों और स्वामित्वधारकों के बीच वैमनस्य चरम पर पहुंच गया। इस पर आश्रित जीविकोपार्जक परिवारों के समर्थन में नक्सलियों ने हथियार उठा लिये, तो दूसरी तरफ स्वामित्व की रक्षा के लिए महुआ स्वामियों ने भी हथियार थाम लिये।

 

इसी बीच औरंगाबाद में जयप्रकाश नारायण के आदर्शों व मूल्यों से ओत-प्रोत विजय प्रकाश(भाप्रसे) की पदस्थापना बतौर जिलाधिकारी हुई। विजय प्रकाश ने जेपी के छात्र आंदोलन के दिनों में उनके आह्वान पर सेंट जेवियर कॉलेज, रांची में स्नातक की परीक्षा का बहिष्कार कर दिया था। विजय प्रकाश ने जेपी के भूदान के तर्ज पर महुआदान की पहल कालापहाड़ में की। वहां के महुआ स्वामियों से जिलाधिकारी ने महुआ पर जीविकोपार्जन के लिए आश्रित परिवारों के लिए ‘महुआदान’ की अपील की।
कालापहाड़ के ग्रामीणों ने मृत्युंजय कुमार सिंह की अगुवाई में जिलाधिकारी की महुआदान की अपील पर सहमति बनायी। इसके बाद कालापहाड़ गांव में जिलाधिकारी विजय प्रकाश के समक्ष महुआ स्वामियों ने जीविकोपार्जन के लिए आश्रित गरीब व वंचित परिवारों को ‘महुआदान’ किया।

 

महुआदान के तहत महुआ स्वामियों ने इसके फल-फूल पर भूमिहीन आश्रित जीविकोपार्जक परिवारों को अधिकार प्रदान किया जबकि भूमि पर महुआ स्वामियों का स्वामित्व कायम रहा। महुआदान के बाद गांव में सामाजिक समरता का महौल कायम हुआ जो आजतक कायम है।

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